कभी आसमान में पतंगें उड़ती थीं, आज मोबाइल के सिग्नल उड़ रहे हैं। पहले बच्चे छत पर चढ़ते थे, अब वाई-फाई का पासवर्ड ढूंढते हैं। पहले "वो काटा..." की गूंज मोहल्लों में सुनाई देती थी, अब "बैटरी लो है..." की आवाज़ हर घर में गूंजती है।
कभी आसमान में पतंगें उड़ती थीं, आज मोबाइल के सिग्नल उड़ रहे हैं। पहले बच्चे छत पर चढ़ते थे, अब वाई-फाई का पासवर्ड ढूंढते हैं। पहले "वो काटा..." की गूंज मोहल्लों में सुनाई देती थी, अब "बैटरी लो है..." की आवाज़ हर घर में गूंजती है।
एक समय था जब पतंग सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि बचपन की सबसे ऊँची उड़ान हुआ करती थी। मांझे से कटती पतंग के पीछे दौड़ते बच्चे, छतों पर जमी महफिलें, हाथों में चरखी और आंखों में आसमान जीतने का सपना—यही तो असली त्योहार था।
आज हालात उलट गए हैं। आसमान खाली है, लेकिन बच्चों की आंखें मोबाइल स्क्रीन से भरी हुई हैं। अब उन्हें हवा का रुख नहीं पता, लेकिन गेम का हर लेवल याद है। चरखी पकड़ने वाले हाथ अब मोबाइल कसकर पकड़ते हैं।
पुराने पतंगबाज़ आज भी जब चरखी हाथ में लेते हैं, तो चेहरे पर वैसी ही चमक लौट आती है जैसी बरसों पहले थी। वे बताते हैं कि पतंग उड़ाना सिर्फ खेल नहीं था, धैर्य, संतुलन, रणनीति और खेल भावना का अभ्यास था। हारने वाला अगले दिन फिर नई पतंग लेकर आता था, क्योंकि तब हार भी मुस्कुराना सिखाती थी।
आज प्रतियोगिताएं होती हैं, पुराने पतंगबाज़ों को सम्मान मिलता है, ट्रॉफियां और पुरस्कार दिए जाते हैं। यह सम्मान सिर्फ खिलाड़ियों का नहीं, बल्कि उस दौर का है जिसने बच्चों को खुला आसमान दिया था। यह उन यादों का सम्मान है जो आज भी हर बसंत के साथ उड़ान भरती हैं।“एक दौर था जब पतंगबाज़ी में इनाम से ज्यादा इज्जत का मुकाबला होता था। ‘पतंगबाज़-ए-आज़म’ और ‘उस्ताद पेचबाज़’ जैसे खिताब जीतना शौकीनों के लिए किसी बड़े तमगे से कम नहीं था।”मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के दौर में नई पीढ़ी पतंगबाजी से दूर होती दिख रही है। पतंग बनाने और बेचने वाले कारीगरों का कहना है कि पहले त्योहारों और खास अवसरों पर महीनों पहले से बाजार सज जाता था, लेकिन अब पहले जैसी रौनक नहीं रही। हल्द्वानी में भी गली मुहल्लो में लगने वाली दुकानें अब ढ़ूढ़ने पर भी नहीं मिल पर रही है थोक पर व्यापार भी सिमट सा गया है!
तकनीक ने जीवन आसान बनाया है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन जब वही तकनीक बचपन का सबसे बड़ा अपहरणकर्ता बन जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बच्चे अब मैदान नहीं खोजते, चार्जर खोजते हैं। दोस्त अब गली में नहीं मिलते, ऑनलाइन मिलते हैं। चेहरे पर धूप नहीं, स्क्रीन की नीली रोशनी पड़ती है।
विडंबना देखिए, माता-पिता कहते हैं—"बेटा बाहर मत जाओ, मोबाइल चला लो।" फिर कुछ साल बाद यही शिकायत करते हैं—"बच्चा किसी से मिलता-जुलता नहीं, बस मोबाइल में लगा रहता है।"
शायद समय आ गया है कि हम फिर से छतों को आबाद करें। पतंगबाज़ी की प्रतियोगिताएं केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को बचपन लौटाने का माध्यम बनें। जब कोई बच्चा पहली बार अपनी पतंग आसमान में उड़ाएगा, तभी उसे समझ आएगा कि असली "हाई स्कोर" मोबाइल स्क्रीन पर नहीं, खुले आसमान में मिलता है।
क्योंकि...
मोबाइल की स्क्रीन आंखों को रोशन करती है, लेकिन पतंग का आसमान जिंदगी को।
तकनीक ज़रूरी है, मगर बचपन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
आइए, बच्चों को फिर से आसमान लौटाएं—ताकि वे सिर्फ इंटरनेट नहीं, अपने सपनों की उड़ान भी पकड़ सकें।