
उत्तराखंड में बिट्रिश शासनकाल के दौरान चीड के जंगलों को जो विस्तार दिया गया था उसका उददेश्य व्यापारिक था, अंग्रेज़ सरकार ने चीड वृक्षों का उपयोंग देश में रेलवे लाइनों कों बिछानें में तो किया ही इससे निकलने वाले लीसा का भी खूब दोहन किया, यही चीड वृक्ष आज उत्तराखंड के जंगलों से खेत खलिहानों तक फैल चुका है। जो परमपरागत मिश्रित वनों के साथ ही जैव विविधता के लिये भी खतरनाक साबित हो रहा है। इससे निकलना वाला लीसा और इसकी पत्तियाॅ अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण गर्मी के मौसम में जंगलों की आग को बढानें मे सहायक होती है, लेकिन अब पिरुल का उपयोग फ्यूल सोर्स के रूप में हो रहा है जिसके लिये पिरुल एकत्रिकरण महिला स्वयं सहायता समूह कर रही है, सरकार ने पिरुल एकत्रिकरण की धनराशि 3 रूपये प्रति किलो से बढाकर 10 रूपये प्रति किलो कर दिया है,
उत्तराखंड के वनों में हर साल दावानल की धटनाओं से जहाॅ करोडों की वन संपदा खाक हो जाती है वही कइ लोगों को भी आग की चपेंट में आकर अपनी जान गवानी पडती है। जंगलों की इस आग से पर्यावरण को जो नुकसान होता है उसकी भरपाइ आसान नही होती, जहाॅ जहाॅ चीड के वन विस्तार ले चुके है उन क्षेंत्रों में दूसरी प्रजाति की वनस्पतियों के खत्म होते जाने से पारिस्थििकी सतुंलन भी बिगड रहा है, यही वजह है की अब उत्तराखंड के लोग चीड को अग्नि वृक्ष की संज्ञा देकर इसके समूल खात्में के लिये आवाज उठाने लगें है। पिरूल यानी चीड़ की पत्तियों का अब फ्यूल सोर्स के रूप में उपयोग किया जाने लगा है, सरकार ने पिरुल एकत्रिकरण की धनराशि 3 रूपये प्रति किलो से बढाकर 10 रूपये प्रति किलो कर दिया है जो आम जनता के लिये रोज़गार के लिहाज़ से बहुत बेहतर साबित हो रहा है, पिरुल एकत्रिकरण का फायदा :
1: जंगलों में आग लगने की संभावना बेहद कम, क्योंकी पिरुल की पत्तियाॅ अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण गर्मी के मौसम में जंगलों की आग को बढानें मे सहायक
2: पिरुल अब फ्यूल सोर्स में इस्तेमाल
3: पिरुल एकत्रिकरण से आम जनता को रोजगार
नैनीताल जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा अभी तक कुल 2357 क्विंटल पीरुल इकट्ठा कर लिया गया है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं पिरुल इकट्ठा करके जंगलों की आग़ रोकने में अपनी कारगर भूमिका निभा रही हैं, विकासखंड ओखलकांडा रामगढ़ धारी बेतालघाट भीमताल तथा कोटाबाग की 76 स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा यह पिरुल एकत्रित किया गया है। इससे न सिर्फ जंगलों की आग पर नियंत्रण हो रहा है बल्कि महिलाओं की आजीविका भी सुदृढ़ हो रही है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं वन विभाग तथा प्राइवेट संस्थानों को पिरुल उपलब्ध कराकर अपना आय सृजन कर रही हैं।
बहरहाल चीड़ परमपरागत मिश्रित वनों के साथ ही जैव विविधता के लिये भी खतरनाक साबित हो रहा है। इससे निकलना वाला लीसा और इसकी पत्तियाॅ अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण गर्मी के मौसम में जंगलों की आग को बढानें मे सहायक होती है, यही वजह है की अब उत्तराखंड के लोग चीड को अग्नि वृक्ष की संज्ञा देकर इसके पिरुल को एकत्रित कर फ्यूल सोर्स के रूप में उपयोग किए जाने के कार्य योजना बना रहे हैं, और महिलाएं जंगल से पिरुल एकत्रित कर अपनी आजीविका को मजबूत कर रही हैं