हरेला महोत्सव के तीसरे दिन देशज प्रजातियों का वृहद पौधारोपण, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन का दिया संदेश
हल्द्वानी। उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और प्रकृति संरक्षण के प्रतीक हरेला पर्व के अवसर पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में हरेला महोत्सव के तीसरे दिन पर्यावरण संरक्षण को समर्पित वृहद पौधारोपण अभियान चलाया गया। विश्वविद्यालय परिसर में मियावाकी पद्धति से सघन वन विकसित करने की पहल के तहत विभिन्न देशज प्रजातियों के पौधे रोपे गए। इस अभियान का उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध और संतुलित पर्यावरण की मजबूत नींव तैयार करना है।

“मानसून का समय वैज्ञानिक दृष्टि से वन स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त है, स्थानीय प्रजातियों के वैज्ञानिक रोपण से कम समय में सघन एवं समृद्ध वन विकसित किए जा सकते हैं।”-:प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट, कुलपति सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा के कुलपति प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट ने पौधारोपण कर किया। उन्होंने कहा कि मानसून का समय वैज्ञानिक दृष्टि से पौधारोपण और वन स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त होता है। यदि स्थानीय प्रजातियों के पौधों को वैज्ञानिक तरीके से लगाया जाए तो कम समय में घने और प्राकृतिक वन विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की इस पहल को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायी कदम बताया।

“हरेला महोत्सव के अंतर्गत विश्वविद्यालय ने 500 पौधों के रोपण का लक्ष्य रखा है। पौधारोपण के साथ प्रत्येक पौधे का संरक्षण और संवर्धन भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।”:- प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी, कुलपति यू.ओ. यू
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि हरेला महोत्सव के अंतर्गत विश्वविद्यालय ने 500 पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उन्होंने कहा कि पौधारोपण तभी सार्थक होगा जब प्रत्येक पौधे की नियमित देखभाल और संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने सभी शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों से इस हरित अभियान को जनभागीदारी का रूप देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के संयोजक एवं वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. एच.सी. जोशी ने बताया कि मियावाकी तकनीक के तहत स्थानीय प्रजातियों के पौधों को सघन रूप से लगाया जाता है, जिससे कम स्थान में कम समय के भीतर प्राकृतिक वन विकसित होता है। यह पद्धति जैव विविधता संरक्षण, कार्बन अवशोषण और हरित आवरण बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। अभियान के दौरान आँवला, तिमिल, सहजन, तेजपात और रीठा सहित अनेक देशज एवं बहुउपयोगी प्रजातियों का रोपण किया गया।

इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने भी पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित यह अभियान हरेला पर्व की मूल भावना—"एक पौधा, सुरक्षित भविष्य"—को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।