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25 Jul, 2026 by Admin

मोदीनगर से हरिद्वार तक दिव्यांग पति को कंधों पर बैठाकर निकली आशा, प्रेम, त्याग और शिवभक्ति की अनूठी मिसाल बनी यात्रा

पति के लिए बनी शक्ति, आस्था के लिए बनी संबल... कंधों पर 180 किमी की कांवड़ यात्रा ने छू लिया हर दिल

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हरिद्वार

सावन की कांवड़ यात्रा में इस बार जहां लाखों शिवभक्त भोलेनाथ की भक्ति में लीन हैं, वहीं हरिद्वार पहुंचा एक दंपति अपनी अनोखी यात्रा के कारण श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यह कहानी केवल कांवड़ यात्रा की नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की है, जिसमें एक पत्नी अपने दिव्यांग पति के लिए सहारा ही नहीं, बल्कि उसके कदम और उसका संबल बन गई है। प्रेम, त्याग, साहस और शिवभक्ति का यह संगम हर किसी की आंखें नम कर रहा है।

मोदीनगर से हरिद्वार तक लगभग 180 किलोमीटर की कठिन यात्रा... तपती सड़कें, बारिश, थकान और लंबे सफर की चुनौतियां... लेकिन इन सबके बीच आशा नाम की एक महिला के चेहरे पर न थकान है और न ही कोई शिकायत। कारण है उनका संकल्प। वह अपने दिव्यांग पति सचिन को कंधों पर बैठाकर हरिद्वार तक लेकर आई हैं, ताकि दोनों मिलकर भगवान शिव का जलाभिषेक कर सकें।

यह दृश्य जहां भी लोगों ने देखा, कदम खुद-ब-खुद रुक गए। राहगीरों ने इस दंपति का हौसला बढ़ाया, कुछ ने फूल बरसाए, तो कई लोगों ने उनके लिए जल और भोजन की व्यवस्था की। हर कोई इस अद्भुत समर्पण को नमन करता दिखाई दिया।

आशा का कहना है कि उनके लिए यह यात्रा किसी बोझ की नहीं, बल्कि सौभाग्य की यात्रा है। उनका मानना है कि विवाह केवल सात फेरों का बंधन नहीं, बल्कि सुख-दुख में एक-दूसरे का सहारा बनने का वचन है। यदि पति चल नहीं सकता, तो पत्नी उसके कदम बन सकती है। यही सच्चा जीवनसाथी होने का अर्थ है।

दिव्यांग शिवभक्त सचिन भावुक होकर कहते हैं कि उन्हें कभी नहीं लगा था कि उनकी पत्नी इस तरह उनका साथ निभाएगी। भगवान शिव की कृपा और पत्नी के अटूट विश्वास ने उन्हें यह शक्ति दी कि वे भी कांवड़ यात्रा का हिस्सा बन सके। उनके अनुसार, यह यात्रा केवल हरिद्वार तक पहुंचने की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और जीवन में उम्मीद जगाने की यात्रा है।

सावन के पवित्र महीने में यह दंपति श्रद्धा और प्रेम का ऐसा संदेश दे रहा है, जो समाज को रिश्तों का वास्तविक अर्थ समझाता है। जब रिश्ते स्वार्थ से ऊपर उठकर समर्पण में बदल जाते हैं, तब कठिन से कठिन राह भी आसान लगने लगती है।

आज जब रिश्तों में दूरी और संवेदनहीनता की बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं, ऐसे समय में आशा और सचिन की यह यात्रा उम्मीद की नई रोशनी लेकर आई है। यह कहानी बताती है कि प्रेम केवल शब्द नहीं, बल्कि निभाने का साहस है। और जब उस प्रेम के साथ भगवान शिव में अटूट आस्था जुड़ जाए, तो हर कठिन रास्ता भी भक्ति का मार्ग बन जाता है।